
मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे मानव समाज, उसकी विसंगतियों और मानवीय मनोविज्ञान का एक जीवंत दस्तावेज हैं। उनकी कहानियों में आम आदमी का संघर्ष, उसकी मजबूरियां और नैतिक पतन का बहुत ही सजीव चित्रण मिलता है। ‘धोखा’ भी एक ऐसी ही अमर कहानी है, जो इंसान के भीतर छिपे लालच, विश्वासघात और अंतरात्मा की आवाज को उजागर करती है।
आइए, मानवीय संवेदनाओं से बुनी इस मर्मस्पर्शी कहानी के सफर पर चलते हैं।
ईमानदारी बनाम अमीरी की चाह
पंडित चंद्रधर एक सीधे-सादे, ईमानदार और संतोषी स्वभाव के प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक थे। उनका पूरा जीवन तंगहाली में गुजरा था, लेकिन उन्होंने कभी अपनी ईमानदारी का सौदा नहीं किया। उनका मानना था कि सूखी रोटी खाकर चैन की नींद सोना, किसी के हक को मारकर मखमली गद्दे पर सोने से कहीं बेहतर है।
इसके विपरीत, उनके पड़ोसी मुंशी रामविलास कचहरी में एक छोटे क्लर्क थे। उनकी तनख्वाह तो चंद्रधर से भी कम थी, लेकिन उनकी ऊपरी कमाई (रिश्वत) का कोई अंत नहीं था। रामविलास के घर में रोज नई वस्तुएं आती थीं, उनका पहनावा कीमती था और उनका दबदबा पूरे मोहल्ले में था। रामविलास अक्सर चंद्रधर की गरीबी का मजाक उड़ाते हुए कहते थे, “पंडित जी, इस ईमानदारी से केवल पेट की भूख मिट सकती है, समाज में इज्जत और बच्चों का भविष्य नहीं सुधारा जा सकता। दुनिया हवा के रुख के साथ चलती है, आप भी थोड़ा हाथ-पैर मारिए।”
पंडित चंद्रधर उनकी बातें सुनकर मुस्कुरा देते, लेकिन कभी-कभी उनके मन में भी अपनी लाचारी और बेटी की शादी की चिंता को लेकर एक अजीब सी छटपटाहट पैदा हो जाती थी।
लालच का जाल और विश्वासघात
समय बीतता गया और पंडित चंद्रधर की बेटी विमला विवाह योग्य हो गई। एक अच्छे घराने से रिश्ता आया, लेकिन लड़के वालों की मांग भारी दहेज की थी। चंद्रधर के पास कुल जमा-पूंजी केवल दो हजार रुपये थी, जबकि जरूरत कम से कम पांच हजार रुपये की थी। चंद्रधर अत्यंत चिंतित रहने लगे। उनका चैन खो गया और रातों की नींद उड़ गई।
पंडित जी की इस लाचारी को मुंशी रामविलास ने भांप लिया। उसने एक दिन सहानुभूति दिखाते हुए कहा, “पंडित जी, आप क्यों व्यर्थ चिंता में घुले जा रहे हैं? मेरे पास एक योजना है। शहर के एक बड़े व्यापारी को अपनी गुप्त बहीखाता की जांच के लिए एक विश्वसनीय और बुद्धिमान व्यक्ति की आवश्यकता है। अगर आप कुछ दिनों के लिए उनका यह काम कर दें, तो वे आपको मुंहमांगा इनाम देंगे। बस थोड़ा सा फेरबदल करना होगा, जिससे उनका टैक्स बच सके।”
चंद्रधर का मन पहले तो इस अनैतिक कार्य के लिए तैयार नहीं हुआ। उन्होंने कहा, “रामविलास, मैंने जीवनभर कभी झूठ का सहारा नहीं लिया। मैं यह धोखा नहीं कर सकता।”
लेकिन रामविलास ने उनके घाव पर नमक छिड़कते हुए कहा, “पंडित जी, आपकी यह ईमानदारी विमला के विवाह में बाधक बन रही है। क्या अपनी झूठी शान के लिए आप अपनी बेटी का भविष्य दांव पर लगा देंगे? यह धोखा नहीं, समय की मांग है।”
अपनी इकलौती बेटी के आंसुओं और उसकी खुशियों के आगे आखिरकार एक लाचार पिता की ईमानदारी घुटने टेक देती है। चंद्रधर ने उस व्यापारी का काम करना स्वीकार कर लिया।
धोखे का अहसास और आत्मग्लानि
चंद्रधर ने दिन-रात एक करके व्यापारी के खातों में हेराफेरी की। उनके भीतर का शिक्षक हर पल उन्हें धिक्कार रहा था, लेकिन बेटी की शादी की विवशता उनके हाथों को काम करने पर मजबूर कर रही थी। काम पूरा होने पर व्यापारी बेहद खुश हुआ और उसने रामविलास के हाथों चंद्रधर के लिए तीन हजार रुपये की भारी रकम भिजवाई।
जब रामविलास वह रकम लेकर चंद्रधर के पास आया, तो चंद्रधर की आंखों में आंसू थे। यह खुशी के आंसू नहीं, बल्कि अपनी ईमानदारी खोने का मलाल था। हालांकि, अब वे अपनी बेटी का विवाह धूमधाम से कर सकते थे। शादी की तैयारियां शुरू हुईं और धूमधाम से विवाह संपन्न हो गया। बेटी विदा हो गई।
शादी के कुछ दिनों बाद, अचानक एक सुबह पंडित चंद्रधर के घर पुलिस आ धमकी। पुलिस ने उन्हें टैक्स चोरी और जालसाजी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। चंद्रधर दंग रह गए। उन्होंने चिल्लाकर कहा, “मैंने तो सिर्फ वह काम किया जो मुंशी रामविलास ने मुझे सौंपा था!”
पुलिस अधिकारी ने हंसते हुए कहा, “पंडित जी, मुंशी रामविलास ने ही हमें यह गुप्त सूचना दी है। उसने व्यापारी के साथ मिलकर सारा दोष आपके सिर मढ़ दिया और खुद को बचा लिया। आपकी लिखी हुई लिखावट ही आपके खिलाफ सबसे बड़ा सबूत है।”
चंद्रधर के पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस पड़ोसी को उन्होंने अपना हितैषी समझा था, जिसने उनकी लाचारी का फायदा उठाकर उन्हें दलदल में धकेला, उसी ने उन्हें सबसे बड़ा ‘धोखा’ दिया था। रामविलास ने व्यापारी से चंद्रधर को फंसाने के बदले बड़ी रकम वसूल की थी।
न्याय और कर्म का सिद्धांत
पंडित चंद्रधर को जेल हो गई। जेल की सलाखों के पीछे वे रोते नहीं थे, बल्कि अपनी उस कमजोरी पर पछताते थे जिसने उन्हें अपनी जीवनभर की पूंजी यानी ‘ईमानदारी’ को खोने पर मजबूर किया था। उन्हें अहसास हो गया था कि गलत रास्ते का अंजाम कभी अच्छा नहीं हो सकता।
उधर, मुंशी रामविलास अपनी इस चालबाजी पर बहुत खुश था। उसने चंद्रधर की बर्बादी पर अट्टहास किया और अपनी नई दौलत के नशे में चूर रहने लगा। लेकिन नियति का अपना एक न्याय होता है।
कुछ ही महीनों बाद, रामविलास का इकलौता बेटा एक गंभीर बीमारी की चपेट में आ गया। रामविलास ने डॉक्टरों पर पानी की तरह पैसा बहाया, लेकिन उसकी हालत बिगड़ती ही गई। अपनी सारी अवैध कमाई लगाने के बाद भी वह अपने बेटे को नहीं बचा सका। बेटा हमेशा के लिए आंखें मूंद चुका था। इस सदमे से रामविलास का मानसिक संतुलन बिगड़ गया। वह रास्ते पर बैठकर पागलों की तरह बड़बड़ाता रहता था, “मैंने पंडित जी को धोखा दिया… भगवान ने मुझे सजा दी…”
जब पंडित चंद्रधर जेल से रिहा होकर वापस आए, तो उन्होंने रामविलास की यह दुर्दशा देखी। उनके मन में कोई क्रोध या प्रतिशोध की भावना नहीं बची थी, केवल एक गहरी सहानुभूति थी। उन्होंने महसूस किया कि दुनिया में सबसे बड़ा धोखा इंसान खुद को देता है जब वह अपने नैतिक मूल्यों को छोड़ देता है।
मुंशी प्रेमचंद की यह कहानी हमें सिखाती है कि भौतिक सुख-सुविधाएं क्षणिक हो सकती हैं, लेकिन हमारी ईमानदारी और चरित्र ही हमारी वास्तविक पूंजी है। गलत रास्ते पर चलकर हासिल की गई सफलता अंततः विनाश का कारण बनती है।
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मुंशी प्रेमचंद की कहानियों में भारतीय ग्रामीण जीवन, पारिवारिक संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं का जो जीवंत चित्रण मिलता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। ‘अलग्योझा’ (Alagyojha) भी एक ऐसी ही उत्कृष्ट और मर्मस्पर्शी कहानी है, जो संयुक्त परिवार के बिखराव, सौतेले रिश्तों की कड़वाहट और अंततः प्रेम व कर्तव्य की विजय को दर्शाती है। यह कहानी हमें सिखाती है कि खून के रिश्तों से बढ़कर इंसानियत, सहिष्णुता और कर्तव्य का रिश्ता होता है।
अलग्योझा का अर्थ और पृष्ठभूमि
ग्रामीण अंचल में ‘अलग्योझा’ का अर्थ होता है—परिवार का आपसी बंटवारा या चूल्हा अलग होना। जब एक संयुक्त परिवार के सदस्य वैचारिक मतभेद या आपसी कलह के कारण अलग-अलग रहने और खाने लगते हैं, तो उसे अलग्योझा कहा जाता है। प्रेमचंद जी ने इस कहानी के माध्यम से ग्रामीण समाज की इस कड़वी सच्चाई को बेहद संजीदगी से उकेरा है।
भोला का परिवार और रघु का समर्पण
कहानी की शुरुआत होती है भोला नामक एक सीधे-साधे किसान के परिवार से। भोला की पहली पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। पहली पत्नी से उसका एक बेटा था—रघु। भोला ने पन्ना नाम की स्त्री से दूसरा विवाह किया, जिससे उसके दो और बेटे हुए—केदार और कन्हैया।
रघु स्वभाव से अत्यंत सीधा, मेहनती और आज्ञाकारी था। अपनी सौतेली माँ पन्ना और सौतेले भाइयों के प्रति उसके मन में कोई द्वेष नहीं था। वह दिन-रात खेतों में पसीना बहाता ताकि उसका परिवार सुखी रह सके। वह स्वयं फटेहाल रहता, लेकिन भाइयों की हर जरूरत को पूरा करना अपना पहला कर्तव्य समझता था। रघु के इस निस्वार्थ समर्पण के कारण ही पूरा घर सुचारू रूप से चल रहा था।
सौतेली माँ पन्ना की असुरक्षा और कलह की शुरुआत
जैसे-जैसे समय बीता, रघु का विवाह मूला नाम की युवती से हो गया। मूला भी अपने पति की तरह ही स्वाभिमानी थी। अब पन्ना के मन में धीरे-धीरे असुरक्षा की भावना पनपने लगी। उसे लगा कि रघु पूरे घर और संपत्ति पर अपना अधिकार जमा रहा है और उसके अपने बेटों (केदार और कन्हैया) का भविष्य खतरे में है। पन्ना की यह ईर्ष्या धीरे-धीरे कलह का रूप लेने लगी।
पन्ना अक्सर मूला को ताने मारती और घर के कामों को लेकर विवाद खड़ा करती। रघु हर विवाद को चुपचाप सह लेता और अपनी पत्नी को भी शांत रहने की सलाह देता। लेकिन पन्ना का द्वेष कम होने का नाम नहीं ले रहा था। अंततः पन्ना ने जिद पकड़ ली कि अब वह रघु के साथ मिलकर नहीं रह सकती और उसने बंटवारे की मांग कर दी।
अलग्योझा: जब बिखर गया हंसता-खेलता परिवार
भोला अपनी पत्नी पन्ना के आगे लाचार था। भारी मन से उसने बंटवारे का निर्णय लिया। अलग्योझा के समय रघु ने अपनी महानता का परिचय दिया। उसने पन्ना और उसके बेटों को अच्छे और उपजाऊ खेत दे दिए और खुद के हिस्से में बंजर जमीन तथा टूटा-फूटा मकान रख लिया।
अलग्योझा केवल संपत्ति का विभाजन नहीं था, बल्कि यह दिलों का टूटना था। रघु को अलग देखकर पूरा गांव पन्ना की आलोचना कर रहा था, लेकिन पन्ना को लग रहा था कि अब वे स्वतंत्र और सुखी रहेंगे। परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था।
विपत्ति का पहाड़ और रघु का बड़प्पन
बंटवारे के कुछ समय बाद ही भोला गंभीर रूप से बीमार पड़ गया और उसकी मृत्यु हो गई। भोला की मृत्यु के बाद पन्ना के परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। केदार और कन्हैया कामचोर और गैर-जिम्मेदार थे। उन्हें खेती का कोई अनुभव नहीं था। धीरे-धीरे उनकी आर्थिक स्थिति खराब होने लगी। कर्ज का बोझ बढ़ता गया और उनके बैल भी मर गए।
इस कठिन घड़ी में भी रघु मूकदर्शक बनकर नहीं रह सका। सौतेली माँ और भाइयों द्वारा किए गए दुर्व्यवहार को भुलाकर रघु उनकी मदद के लिए आगे आया। उसने न केवल अपने बैलों से उनके खेतों की जुताई की, बल्कि अपनी जमा-पूंजी से उनके लिए अनाज और चारे की व्यवस्था भी की। रघु ने केदार और कन्हैया को बड़े भाई की तरह डांटकर सही राह पर लाया और उन्हें जिम्मेदार बनाया।
प्रायश्चित और पुनर्मिलन
रघु की इस निस्वार्थ सेवा, उदारता और बड़प्पन ने पन्ना के भीतर की ईर्ष्या और नफरत को पूरी तरह पिघला दिया। उसे अपनी भूल का गहरा अहसास हुआ। वह समझ गई कि जिस रघु को वह पराया समझकर दूर कर रही थी, वही वास्तव में संकट के समय उनका सच्चा सहारा बना। पन्ना की आँखें भर आईं और उसने रघु से रोते हुए अपने किए की माफी मांगी।
निष्कर्ष: प्रेमचंद जी का संदेश
‘अलग्योझा’ कहानी के माध्यम से मुंशी प्रेमचंद जी ने यह संदेश दिया है कि भौतिक वस्तुओं और जमीन-जायदाद का बंटवारा तो किया जा सकता है, लेकिन यदि मन में स्नेह, आत्मीयता और कर्तव्य की भावना जीवित है, तो रिश्तों को बिखरने से बचाया जा सकता है। रघु का चरित्र हमें सहनशीलता, त्याग और बड़प्पन की सीख देता है।
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Preparing for the SSC CGL 2026 Exam requires consistent practice along with a strong understanding of concepts. One of the best ways to improve your preparation is by attempting SSC CGL Free Mock Test Series 2026. These mock tests help candidates understand the latest exam pattern, improve speed, identify weak areas, and build confidence before the actual examination.
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SSC CGL Free Mock Tests 2026; Full Length
The SSC CGL Full Length Mock Test 2026 is designed to simulate the real examination environment. These tests follow the latest SSC CGL pattern and difficulty level so that candidates can experience the actual exam before appearing in it.
Benefits of SSC CGL Full-Length Mock Tests
- Covers the complete SSC CGL syllabus.
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Why Attempt Full-Length Tests?
A full-length mock test gives candidates the confidence to handle exam pressure. Regular practice improves question-solving speed, reduces silly mistakes, and increases overall accuracy.
For better preparation, candidates should also refer to SSC CGL Preparation Strategy, SSC CGL Study Plan, and SSC CGL Study Material to strengthen their concepts.
SSC CGL Mock Test Free 2026; Sectional Tests
Sectional Tests are designed for candidates who want to improve performance in individual subjects.
SSC CGL Sectional Mock Tests Include
- General Intelligence & Reasoning
- General Awareness
- Quantitative Aptitude
- English Comprehension
- Mathematical Abilities
- Statistics (Tier 2)
- Computer Knowledge
Advantages of Sectional Tests
- Focus on one subject at a time.
- Improve weak sections.
- Better accuracy in difficult topics.
- Faster concept revision.
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Candidates preparing section-wise should regularly revise from SSC CGL Study Material and follow the latest SSC CGL Exam Pattern and Syllabus.
SSC CGL Mock Test 2026; Chapter Tests
Chapter-wise mock tests are the best option for beginners as well as experienced candidates.
Instead of attempting the entire syllabus together, candidates can master one topic before moving to the next.
Important Chapter Tests
Quantitative Aptitude
- Percentage
- Profit & Loss
- Ratio & Proportion
- Number System
- Average
- Time & Work
- Speed, Time & Distance
- Algebra
- Geometry
- Mensuration
- Trigonometry
- Data Interpretation
English
- Reading Comprehension
- Error Detection
- Cloze Test
- Fill in the Blanks
- Vocabulary
- Synonyms
- Antonyms
- Idioms & Phrases
- Active Passive
- Direct Indirect Speech
Reasoning
- Coding-Decoding
- Analogy
- Classification
- Blood Relation
- Seating Arrangement
- Syllogism
- Mirror Image
- Paper Folding
- Cube & Dice
General Awareness
- History
- Geography
- Polity
- Economics
- Current Affairs
- Science
- Static GK
Attempting chapter tests regularly ensures strong conceptual clarity before moving to sectional and full-length tests.
SSC CGL Exam Pattern 2026
Understanding the exam pattern is the first step toward effective preparation.
SSC CGL Tier 1 Exam Pattern
| Subject | Questions | Marks |
| General Intelligence & Reasoning | 25 | 50 |
| General Awareness | 25 | 50 |
| Quantitative Aptitude | 25 | 50 |
| English Comprehension | 25 | 50 |
Total Questions: 100
Total Marks: 200
Duration: 60 Minutes
Negative Marking
- 0.50 mark deducted for every incorrect answer.
Candidates should carefully understand the SSC CGL Exam Pattern and Syllabus before starting preparation.
SSC CGL Syllabus 2026
The SSC CGL syllabus covers multiple subjects.
Quantitative Aptitude
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- Geometry
- Trigonometry
- Percentage
- Profit & Loss
- Average
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- Time & Distance
- Time & Work
- Data Interpretation
English
- Grammar
- Vocabulary
- Reading Comprehension
- Error Detection
- Cloze Test
- Sentence Improvement
- Idioms & Phrases
Reasoning
- Analogy
- Coding
- Series
- Puzzle
- Blood Relation
- Direction
- Syllogism
General Awareness
- Current Affairs
- History
- Geography
- Economics
- Constitution
- Science
- Environment
- Important Days
- Books & Authors
Candidates should complete the syllabus using quality SSC CGL Study Material and revise regularly.
SSC CGL Previous Year Question Papers
Previous year papers remain one of the most important resources for SSC preparation.
Benefits
- Understand question trends.
- Know important topics.
- Improve speed.
- Analyze difficulty level.
- Practice real SSC questions.
- Identify repeated concepts.
Experts recommend solving at least the previous 8–10 years of SSC CGL Previous Year Question Paper along with mock tests for maximum success.
SSC CGL Best Books
Choosing the right books plays an important role in preparation.
Quantitative Aptitude
- Fast Track Objective Arithmetic
- Quantum CAT
- SSC Mathematics by Rakesh Yadav
English
- Objective General English by S.P. Bakshi
- Plinth to Paramount
- Word Power Made Easy
Reasoning
- A Modern Approach to Verbal & Non-Verbal Reasoning
- Analytical Reasoning
General Awareness
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- NCERT Books
- Monthly Current Affairs Magazine
Candidates can explore more recommended resources through SSC CGL Best Books.
Why Should You Attempt SSC CGL Free Mock Test Series 2026?
Regular mock test practice offers several advantages:
- Builds confidence.
- Improves speed.
- Enhances accuracy.
- Identifies weak topics.
- Strengthens conceptual understanding.
- Helps manage time effectively.
- Familiarizes candidates with the latest exam pattern.
- Provides detailed performance reports.
- Offers All India ranking.
- Improves overall score through continuous practice.
A balanced preparation approach includes mock tests, revision, and regular practice using SSC CGL Study Material, SSC CGL Preparation Strategy, and a structured SSC CGL Study Plan.
Tips to Score High in SSC CGL Mock Tests
- Attempt one full-length mock test every week initially, then increase the frequency closer to the exam.
- Analyze every incorrect answer instead of only checking the score.
- Revise weak topics before taking another test.
- Solve sectional tests regularly for subjects where you score less.
- Practice chapter-wise tests to strengthen fundamentals.
- Follow a realistic SSC CGL Study Plan with daily revision.
- Compare mock performance with SSC CGL Previous Year Question Paper trends to identify recurring topics.
SSC CGL Free Mock Test FAQs
Ques: Is SSC CGL Free Mock Test Series really free?
Ans: Yes. Many platforms provide free SSC CGL mock tests, including full-length, sectional, and chapter-wise tests. Some advanced features may require registration.
Ques: Are these mock tests based on the latest SSC CGL syllabus?
Ans: Yes. The tests are generally prepared according to the latest SSC CGL Exam Pattern and Syllabus.
Ques: How many mock tests should I attempt before the exam?
Ans: A good target is 30–50 full-length mock tests along with regular sectional and chapter-wise practice.
Ques: Do mock tests improve SSC CGL scores?
Ans: Yes. Consistent mock test practice significantly improves speed, accuracy, confidence, and time management.
Ques: Should I solve previous year papers along with mock tests?
Ans: Absolutely. Solving SSC CGL Previous Year Question Paper alongside mock tests helps you understand the actual exam trend and frequently asked concepts.
Ques: Which is more important: mock tests or study material?
Ans: Both are equally important. First build concepts using SSC CGL Study Material, then reinforce them through mock tests and revision.
Ques: What is the ideal preparation strategy for SSC CGL 2026?
Ans: The ideal strategy combines concept-building, daily revision, regular mock tests, previous year papers, and a disciplined SSC CGL Preparation Strategy supported by a well-structured SSC CGL Study Plan.

सभ्यता क्या है? क्या यह अच्छे कपड़े पहनना, बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमना और समाज में ऊंचा स्थान रखना है, या फिर इसका संबंध हमारे चरित्र और आंतरिक विचारों से है? महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने अपनी इस बेहतरीन कहानी में सभ्यता के इसी अनसुलझे रहस्य पर से पर्दा उठाया है। यह कहानी हमें समाज के उस दोहरे चरित्र से रूबरू कराती है, जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं।
सभ्यता की बाहरी चमक और आंतरिक खोखलापन
आमतौर पर हम जिसे ‘सभ्य’ कहते हैं, वह अक्सर केवल एक मुखौटा होता है। समाज में रहने वाले बड़े-बड़े अधिकारी, वकील और रईस लोग खुद को सभ्य घोषित करते हैं। उनके पास बैठने के लिए मखमली सोफे होते हैं, बात करने का एक सलीका होता है और वे कानून की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। लेकिन क्या वास्तव में वे सभ्य हैं?
कहानी के मुख्य पात्र राय साहब एक ऊंचे सरकारी पद पर आसीन हैं। वे समाज में बेहद सम्मानित हैं। उनका रहन-सहन, उनके विचार और उनका रहन-सहन सब कुछ ‘सभ्यता’ की परिभाषा में बिल्कुल फिट बैठता है। वे रोज सुबह उठकर देश-विदेश की समस्याओं पर चर्चा करते हैं, गरीबों के प्रति सहानुभूति जताते हैं और ईमानदारी पर लंबे-चौड़े भाषण देते हैं। लेकिन इस चमकदार सभ्यता के पीछे एक काला सच छिपा है, जिसे साधारण लोग नहीं देख पाते।
डमरी: एक गरीब और ‘असभ्य’ मजदूर
दूसरी तरफ डमरी नाम का एक सीधा-साधा, अनपढ़ मजदूर है। वह दिन-रात राय साहब के घर पर मेहनत करता है। उसे सभ्यता के नियमों का ज्ञान नहीं है। वह मैले-कुचैले कपड़े पहनता है, टूटी-फूटी भाषा बोलता है और दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करता है। समाज की नजर में वह ‘असभ्य’ और पिछड़ा हुआ है।
डमरी के पास दो बैल हैं, जो उसके जीवन का एकमात्र सहारा हैं। एक दिन काम से लौटते समय डमरी देखता है कि उसके बैलों के लिए चारा नहीं है। पैसे न होने के कारण वह लाचार महसूस करता है। अपने भूखे बैलों की तड़प उससे देखी नहीं जाती। अंततः, वह पास के एक खेत से चुपके से थोड़ा सा चारा काट लेता है। उसे लगता है कि इस छोटे से काम से किसी का भारी नुकसान नहीं होगा और उसके बेजुबान जानवरों का पेट भर जाएगा।
न्याय का दोहरा मापदंड
लेकिन डमरी की यह ‘चोरी’ पकड़ ली जाती है। समाज के ठेकेदार और कानून के रखवाले तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। डमरी को एक अपराधी की तरह पेश किया जाता है। राय साहब, जो खुद को न्यायप्रिय और सभ्य मानते हैं, डमरी की इस हरकत पर बेहद क्रोधित होते हैं। वे उसे नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं और पुलिस के हवाले करने की धमकी देते हैं।
यहाँ प्रेमचंद जी सभ्यता के असली रहस्य को उजागर करते हैं। राय साहब खुद हर दिन हजारों रुपये की रिश्वत लेते हैं। वे सरकारी फाइलों में हेरफेर करते हैं, ठेकेदारों से गुप्त समझौते करते हैं और समाज की आंखों में धूल झोंककर धन इकट्ठा करते हैं। लेकिन उनकी इस बड़ी चोरी को ‘सभ्यता की चादर’ ढक लेती है। वे अपनी चतुर बातों और ऊंचे पद के दम पर कभी पकड़े नहीं जाते।
दूसरी ओर, डमरी जिसने केवल अपने जानवरों की जान बचाने के लिए चंद पैसों के चारे की चोरी की थी, उसे समाज का सबसे बड़ा पापी और असभ्य घोषित कर दिया जाता है। उसके पास अपनी रक्षा के लिए न तो पैसे हैं और न ही कोई रसूख।
सभ्यता का असली रहस्य
इस कहानी के माध्यम से प्रेमचंद यह स्पष्ट करते हैं कि आधुनिक समाज में ‘सभ्यता’ केवल अपने पापों को छिपाने की एक कला बन कर रह गई है। जो व्यक्ति जितनी चतुराई से अपनी बेईमानी और मक्कारी को छिपा सकता है, वह उतना ही अधिक ‘सभ्य’ माना जाता है। वहीं दूसरी ओर, एक गरीब इंसान जो अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए छोटी सी गलती भी करता है, उसे कानून और समाज का कठोरतम दंड भुगतना पड़ता है।
सभ्यता का असली रहस्य यही है कि यह अमीरों के लिए एक ढाल है और गरीबों के लिए एक तलवार। हमें जरूरत है एक ऐसी सभ्यता की जो बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, ईमानदारी और न्यायप्रियता से परिभाषित हो।
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हिंदी साहित्य के अमर कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने जहाँ एक ओर समाज की कुप्रथाओं और गरीबी पर गंभीर कहानियाँ लिखी हैं, वहीं दूसरी ओर उन्होंने अपनी लेखनी से हास्य और व्यंग्य की ऐसी धारा बहाई है जो पाठकों को लोटपोट कर देती है। उनकी ऐसी ही एक बेहद लोकप्रिय और मजेदार कहानी है—‘निमंत्रण’ (Nimantran)। यह कहानी पंडित मोटेराम शास्त्री के भोजन-प्रेम और उनके लालच को बेहद मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत करती है।
पंडित मोटेराम शास्त्री का परिचय
काशी के पंडित मोटेराम शास्त्री अपने ज्ञान के लिए जितने प्रसिद्ध थे, उससे कहीं अधिक वे अपने भोजन-भट्ट स्वभाव के लिए जाने जाते थे। पंडित जी के लिए संसार का सबसे बड़ा सुख था—’मुफ्त का निमंत्रण’। जहाँ कहीं भी यज्ञ, श्राद्ध, ब्रह्मभोज या कोई मांगलिक उत्सव होता, पंडित मोटेराम जी वहाँ सबसे अग्रिम पंक्ति में विराजमान मिलते थे। उनका मानना था कि ईश्वर ने पेट भरने के लिए ही मनुष्य को इस धरती पर भेजा है, और यदि भोजन मुफ्त का हो, तो उसे ग्रहण करने में संकोच कैसा?
पंडित जी की इस जीवन-शैली में उनकी धर्मपत्नी, सोना देवी भी उनका पूरा सहयोग देती थीं। वे दोनों मिलकर हर उस अवसर की तलाश में रहते थे जहाँ स्वादिष्ट पकवानों का स्वाद चखा जा सके।
जब मिला रानी साहिबा का महाभोज का निमंत्रण
एक दिन पंडित मोटेराम शास्त्री के भाग्य जाग उठे। उन्हें नगर की प्रसिद्ध और दानवीर रानी साहिबा के यहाँ से एक विशाल ब्रह्मभोज का निमंत्रण मिला। इस निमंत्रण की विशेषता यह थी कि इसमें काशी के चुनिंदा और श्रेष्ठ विद्वानों को आमंत्रित किया गया था।
जैसे ही यह शुभ समाचार पंडित जी के कानों तक पहुँचा, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने तुरंत अपनी पत्नी सोना को पुकारा और हर्षित स्वर में कहा, “सोना! आज तो साक्षात अन्नपूर्णा माँ प्रसन्न हुई हैं। रानी साहिबा के यहाँ से बुलावा आया है। सुना है पाँच सौ कड़ाहियों में शुद्ध घी की पूरियाँ और कचौड़ियाँ छन रही हैं। मिठाइयों का तो कोई अंत ही नहीं है।”
सोना भी इस समाचार से अत्यंत प्रसन्न हुईं, लेकिन उन्हें एक चिंता सता रही थी। उन्होंने पूछा, “पर स्वामी! क्या इस भोज में केवल आपको ही बुलाया गया है, या बच्चों के लिए भी कुछ व्यवस्था है?”
पंडित जी ने मुस्कुराते हुए अपनी बड़ी सी तोंद पर हाथ फेरा और कहा, “तुम चिंता क्यों करती हो? मैं ऐसी जुगत लगाऊँगा कि हमारे दोनों बालक—अलखराम और जोखू भी इस महायज्ञ में हिस्सा लेंगे। मैं उन्हें अपने साथ विद्वान शिष्यों के रूप में लेकर जाऊँगा।”
बच्चों को मिली भोजन की विशेष दीक्षा
महाभोज पर प्रस्थान करने से पहले, पंडित मोटेराम जी ने अपने दोनों पुत्रों को बुलाकर एक विशेष ‘भोजन दीक्षा’ दी। यह दृश्य अत्यंत ही कौतुकपूर्ण था। पंडित जी ने बच्चों को समझाते हुए कहा:
- शुरुआत धीमी रखना: “देखो बच्चों, पत्तल सजते ही सीधे पूरियों पर टूट मत पड़ना। पहले धीरे-धीरे चबाकर खाना, ताकि पेट में हवा के लिए जगह न बचे और केवल माल ही माल अंदर जाए।”
- पानी से परहेज: “भोजन के बीच में पानी बिल्कुल मत पीना। पानी पीने से पेट जल्दी भर जाता है और कीमती मिठाइयों के लिए जगह कम पड़ जाती है।”
- लाज-शर्म का त्याग: “वहाँ संकोच करने की कोई आवश्यकता नहीं है। जब परोसने वाला आए, तो अपनी पत्तल बढ़ा देना और संकोच मत करना।”
पुत्रों ने अपने पिता के इन गुरु-मंत्रों को बड़े ध्यान से सुना और मन ही मन अपनी तैयारी पूरी कर ली।
महाभोज का दृश्य और पंडित जी का पराक्रम
जब पंडित मोटेराम शास्त्री अपने दोनों ‘शिष्यों’ के साथ रानी साहिबा के महल पहुंचे, तो वहाँ का भव्य नजारा देखकर उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। हवा में शुद्ध देसी घी, केसर और इलायची की खुशबू तैर रही थी। पंडित जी के मुंह में पानी आ गया।
पंडित जी और उनके बच्चों को बैठने के लिए उत्तम आसन दिए गए। जैसे ही पत्तल बिछी और परोसने वालों ने गरमा-गरम पूरियाँ, कचौड़ियाँ, विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ, रायता, रबड़ी और बालूशाही परोसनी शुरू की, पंडित जी की आँखें चमक उठीं।
पंडित जी ने अपने आराध्य देव का स्मरण किया और भोजन का श्रीगणेश किया। उनके हाथ इतनी तीव्र गति से चल रहे थे कि परोसने वाले भी हैरान थे। कड़ाही से निकली गर्म पूरियाँ सीधे पंडित जी के मुख-विवर में समाती जा रही थीं। उन्होंने अपने बच्चों की तरफ देखा, जो उनके निर्देशों का पूरी निष्ठा से पालन कर रहे थे।
मोटेराम जी ने चिल्लाकर कहा, “अरे भाई परोसने वाले! जरा इधर भी ध्यान दो। यह कचौड़ी अत्यंत स्वादिष्ट है, चार-पाँच और रख दो। और हाँ, वह रबड़ी की बाल्टी जरा इधर लाना, पंडित जी का पेट अभी आधा भी नहीं भरा है!”
अति का अंत और हास्यप्रद परिणाम
भोजन का दौर घंटों चला। जब अंततः पंडित जी का हाथ रुका, तो उनकी स्थिति देखने लायक थी। अत्यधिक भोजन कर लेने के कारण उनका पेट किसी नगाड़े की तरह तन चुका था। उनसे अब सीधे बैठा भी नहीं जा रहा था। वे वहीं फर्श पर धीरे से लेट गए और लंबी-लंबी साँसें लेने लगे।
रानी साहिबा ने जब पंडित जी की यह दशा देखी, तो वे चिंतित हो गईं और उन्होंने तुरंत राजवैद्य को बुलवाया। राजवैद्य जी ने आकर जब पंडित जी की नब्ज टटोली, तो वे अपनी हँसी नहीं रोक पाए।
वैद्य जी ने मुस्कुराते हुए रानी साहिबा से कहा, “चिंता की कोई बात नहीं है। पंडित जी को कोई रोग नहीं है, बस इन्होंने अपनी क्षमता से चार गुना अधिक भोजन कर लिया है। यदि यह थोड़ा टहल लें, तो आराम मिल जाएगा।”
पंडित मोटेराम जी ने वहीं लेटे-लेटे कराहते हुए कहा, “वैद्य जी! टहलने की बात मत कीजिए। इस समय यदि कोई मुझे थोड़ा सा हिला भी देगा, तो अनर्थ हो जाएगा। बस कोई ऐसी अचूक औषधि दे दीजिए जो इस भोजन को तुरंत पचा दे, क्योंकि शाम को मुझे एक और यजमान के यहाँ ‘निमंत्रण’ में जाना है!”
पंडित जी की यह बात सुनकर वहाँ उपस्थित रानी साहिबा, वैद्य जी और अन्य सभी दरबारी पेट पकड़कर हँसने लगे।
निष्कर्ष
मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘निमंत्रण’ जहाँ हमें गुदगुदाती है, वहीं यह इंसानी लालच और मुफ्तखोरी की आदत पर एक तीखा व्यंग्य भी करती है। यह कहानी सिखाती है कि अति किसी भी चीज की बुरी होती है, चाहे वह स्वादिष्ट भोजन ही क्यों न हो।
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परिचय: धर्म का मुखौटा और लोभ की भूख
बनारस के समीप बसे शिवपुर गाँव में पंडित रामशरण का बड़ा मान-सम्मान था। माथे पर त्रिपुंड चंदन, गले में रुद्राक्ष की माला और जुबान पर हमेशा राम-नाम का वास। गाँव का कोई भी व्यक्ति उनके बिना किसी धार्मिक अनुष्ठान की कल्पना नहीं कर सकता था। लोग उन्हें निष्पाप और साक्षात् धर्मराज मानते थे। लेकिन सत्य तो यह था कि रामशरण के भीतर लोभ और कपट का एक ऐसा अंधकार पनप रहा था, जिसे उनकी चमकीली धार्मिक आभा ने बड़ी चतुराई से ढक रखा था।
उसी गाँव में फूलमती नाम की एक गरीब विधवा रहती थी। उसके पति की अकाल मृत्यु के बाद, उसके पास जीने का एकमात्र सहारा उसकी डेढ़ बीघा उपजाऊ ज़मीन और उसका आठ साल का बेटा माधव था। फूलमती दिन-रात हाड़-तोड़ मेहनत करके अपने बेटे का पेट पालती थी। लेकिन रामशरण की कुटिल नज़रें काफी समय से फूलमती की उस उपजाऊ ज़मीन पर टिकी थीं।
षड्यंत्र का ताना-बाना और विश्वासघात
एक वर्ष गाँव में भयंकर सूखा पड़ा। फसलें बर्बाद हो गईं और फूलमती के घर में दाने-दाने की किल्लत हो गई। उसका बेटा माधव भूख से तड़पने लगा और बीमार पड़ गया। बेबस फूलमती मदद की गुहार लेकर पंडित रामशरण के पास पहुँची। रामशरण को अपनी चाल चलने का यह सबसे सही अवसर लगा।
उन्होंने अत्यंत सहानुभूति दिखाते हुए कहा, “फूलमती, तू घबरा मत। विपत्ति के समय एक ब्राह्मण ही दूसरे के काम आता है। मैं तुझे माधव के इलाज और अनाज के लिए पैसे दूँगा। बस, तू सुरक्षा के तौर पर अपनी ज़मीन के कागज़ात मेरे पास रख दे। जब तेरे पास पैसे आ जाएँ, तो अपनी ज़मीन वापस ले लेना।”
सरल स्वभाव की फूलमती पंडित जी के इस जाल को समझ नहीं पाई। उसने अश्रुपूरित नेत्रों से रामशरण के पैर छुए और कोरे कागज़ पर अपने अँगूठे का निशान लगा दिया। उसे क्या पता था कि वह अपनी ज़मीन नहीं, बल्कि अपनी और अपने बच्चे की किस्मत उस कागज़ पर गिरवी रख रही थी।
पाप की नींव पर खड़ा आलीशान साम्राज्य
कुछ ही महीनों में सूखे का प्रकोप कम हुआ। जब फूलमती कर्ज चुकाने और अपनी ज़मीन वापस लेने पंडित जी के द्वार पर पहुँची, तो रामशरण के तेवर बदले हुए थे। उन्होंने कड़ककर कहा, “कैसी ज़मीन? वह ज़मीन तो तूने मुझे बेच दी है। यह देख, तेरे अँगूठे का निशान! अब यहाँ से चली जा, वरना गाँव वालों के सामने मुँह दिखाने लायक नहीं बचेगी।”
फूलमती के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह रोई, गिड़गिड़ाई, लेकिन रामशरण का दिल नहीं पसीजा। उसने पंचायत बुलाई, परंतु पंडित जी के रसूख और जाली दस्तावेज़ों के सामने एक लाचार विधवा की आवाज़ दबकर रह गई। थक-हारकर फूलमती अपने बेटे को लेकर गाँव छोड़कर चली गई, लेकिन जाते-जाते उसकी आँखों से निकले आँसू और उसकी मूक आहें रामशरण के घर की चौखट पर अपना साया छोड़ गईं।
रामशरण ने उस ज़मीन पर एक विशाल अनाज का गोदाम बनवाया। व्यापार दिन दूना रात चौगुना बढ़ने लगा। वह ज़मीन सोने की खान साबित हो रही थी। लेकिन बाहरी समृद्धि के पीछे एक अदृश्य आग सुलगने लगी थी, जो धीरे-धीरे रामशरण के जीवन को भस्म करने के लिए तैयार हो रही थी।
अंतरात्मा का अग्निकुंड और पश्चाताप की तड़प
कहते हैं कि ईश्वर के यहाँ देर है, अंधेर नहीं। रामशरण का इकलौता पुत्र, देवव्रत, जिसे वह अपने प्राणों से भी बढ़कर प्यार करता था, अचानक एक अज्ञात और गंभीर बीमारी की चपेट में आ गया। बड़े से बड़े वैद्यों और डॉक्टरों को बुलाया गया, पानी की तरह पैसा बहाया गया, लेकिन देवव्रत की हालत बिगड़ती ही गई।
रात के सन्नाटे में, जब पूरा गाँव सो जाता, रामशरण को अपने ही घर में अजीब सी बेचैनी महसूस होती। हवा की सरसराहट में उसे फूलमती के रोने की आवाज़ सुनाई देती। जब वह अपनी आँखें बंद करता, तो उसे दिखाई देता कि उसका बेटा देवव्रत जलते हुए कोयलों के एक बड़े कुंड में खड़ा है और मदद के लिए पुकार रहा है। वह कुंड किसी और चीज़ का नहीं, बल्कि उसके द्वारा किए गए पापों का ‘अग्निकुंड’ था।
एक रात देवव्रत की हालत बहुत नाजुक हो गई। वह तेज़ बुखार में बड़बड़ा रहा था, “पिताजी, मुझे बचाइए! यह आग मुझे जला रही है। फूलमती चाची खड़ी हैं, वे मुझे अपनी ओर खींच रही हैं!”
यह सुनते ही रामशरण के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। उनका सारा अहंकार, उनकी धन-दौलत और समाज में उनका झूठा सम्मान एक पल में मिट्टी में मिल गया। उन्हें समझ आ गया कि उनके बेटे की इस हालत का कारण और कोई नहीं, बल्कि उनका अपना ही लोभ और पाप था। वे समझ गए कि जब तक वे उस पाप की आग को शांत नहीं करेंगे, तब तक उनका कुल सुखी नहीं हो सकता।
प्रायश्चित की राह और मुक्ति
सुबह होते ही पंडित रामशरण बदहवास हालत में फूलमती को खोजने निकल पड़े। कई दिनों की तलाश के बाद, उन्हें पता चला कि वह पास के एक शहर में मजदूरी करके अपना और अपने बेटे का जीवनयापन कर रही है। रामशरण जब वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि फूलमती भूख से बेहाल, मिट्टी में काम कर रही थी।
रामशरण बिना देर किए उसके पैरों में गिर पड़े। उनकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी। उन्होंने रोते हुए कहा, “फूलमती, मुझे क्षमा कर दो! मैं पापी हूँ, मैंने तुम्हारे साथ छल किया। यह लो तुम्हारी ज़मीन के कागज़ात और यह तुम्हारे नुकसान का हर्जाना। बस ईश्वर से प्रार्थना करो कि वह मेरे बेटे के प्राण बख्श दे।”
फूलमती का कोमल हृदय पिघल गया। उसने रामशरण को उठाया और कहा, “पंडित जी, मैंने तो आपको उसी दिन माफ कर दिया था, क्योंकि न्याय करने वाला तो ऊपर बैठा है।”
घर लौटकर जब रामशरण ने देखा, तो देवव्रत का बुखार उतर चुका था और वह मुस्कुरा रहा था। रामशरण को महसूस हुआ जैसे उनके भीतर सुलग रहा पाप का वह भयानक अग्निकुंड हमेशा के लिए शांत हो गया हो। उन्होंने समझ लिया था कि असली धर्म कर्मकांडों में नहीं, बल्कि मन की पवित्रता और परोपकार में है।
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प्रस्तावना: मोक्ष की खोज
पंडित आलोकनाथ अपने गाँव के सबसे प्रतिष्ठित और कर्मकांडी ब्राह्मण थे। उनका पूरा जीवन शास्त्रों के अध्ययन, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों में बीता था। अब जबकि उनका शरीर शिथिल होने लगा था और बुढ़ापा उन पर हावी हो रहा था, उनके मन में केवल एक ही अभिलाषा बची थी—’मोक्ष’। वे चाहते थे कि मृत्यु के बाद उनकी आत्मा सीधे बैकुंठ धाम जाए और उन्हें इस संसार के आवागमन के चक्र से मुक्ति मिल जाए।
पंडित आलोकनाथ और उनकी साधना
मोक्ष प्राप्त करने के लिए आलोकनाथ ने अत्यंत कठोर नियम बना रखे थे। वे भोर में तीन बजे उठकर गंगा स्नान करते, घंटों जप करते और केवल फलाहार पर जीवन व्यतीत करते थे। उन्होंने अपनी जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई एक विशेष लाल पोटली में सहेज कर रखी थी, जिससे वे काशी जाकर अपने अंतिम दिनों में दान-पुण्य और गोदान कर सकें। उनका दृढ़ विश्वास था कि इन बाह्य कर्मकांडों और दान-दक्षिणा के बिना मोक्ष की प्राप्ति असंभव है। वे अक्सर गाँव के लोगों को उपदेश दिया करते थे कि संन्यास और वैराग्य ही स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
परीक्षा की घड़ी: मंगरू का संकट
गाँव के छोर पर मंगरू नाम का एक गरीब और तथाकथित अछूत रहता था। वह अत्यंत निर्धन था और दिन भर मेहनत-मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पालता था। कुछ दिनों से मंगरू गंभीर रूप से बीमार था। भूख और बीमारी ने उसके शरीर को जर्जर कर दिया था। उसकी झोपड़ी से अक्सर खांसने और कराहने की आवाजें आती थीं, लेकिन गाँव का कोई भी समृद्ध व्यक्ति उसकी मदद के लिए आगे नहीं आता था। लोग उसे उसकी नियति और कर्मों का फल मानकर अनदेखा कर देते थे।
एक रात, जब चारों ओर घना अंधेरा और सन्नाटा पसरा हुआ था, बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। पंडित आलोकनाथ अपने गर्म और सुरक्षित कमरे में बैठकर मोक्षदायिनी कथाओं का पाठ कर रहे थे। अचानक उनके दरवाजे पर किसी ने तेजी से दस्तक दी। आलोकनाथ ने थोड़ा चिढ़ते हुए उठकर दरवाजा खोला, तो सामने मंगरू की छोटी बेटी खड़ी थी। वह ठंड और डर से कांप रही थी और उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह रही थी।
उसने रोते हुए हाथ जोड़कर कहा, “पंडित जी! मेरे बाबा की सांसें उखड़ रही हैं। वे तड़प रहे हैं। वैद्य जी ने कहा है कि अगर आज रात उन्हें दवा और गर्म दूध न मिला, तो वे सुबह का सूरज नहीं देख पाएंगे। कृपया मेरी मदद कीजिए, मुझे थोड़े पैसे उधार दे दीजिए। भगवान आपका भला करेगा।”
पंडित जी असमंजस में पड़ गए। उनके मन में पहला विचार आया कि इस लड़की को छूने से उनका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा और उनकी पवित्रता नष्ट हो जाएगी। दूसरा विचार उस पोटली का आया, जिसे उन्होंने अपने मोक्ष और काशी-यात्रा के लिए बचाकर रखा था। उन्होंने कठोर आवाज में कहा, “बेटी, इस समय मेरे पास फालतू पैसे नहीं हैं। और वैसे भी, मैं पूजा में बैठा हूँ। तुम कल सुबह आना।”
अंतरात्मा की आवाज और सत्य का बोध
लड़की रोती-बिलखती वापस लौट गई। पंडित जी ने दरवाजा बंद कर लिया और दोबारा भगवान की मूर्ति के सामने बैठ गए। लेकिन इस बार उनका मन पूजा में बिल्कुल नहीं लगा। उनके कानों में उस अबोध बच्ची की सिसकियाँ और मंगरू के कराहने की हृदयविदारक आवाज गूंज रही थी। उन्होंने जैसे ही ध्यान लगाने के लिए आंखें बंद कीं, उन्हें भगवान की भव्य मूर्ति के स्थान पर भूखा-प्यासा, तड़पता हुआ मंगरू दिखाई देने लगा।
अचानक आलोकनाथ के भीतर एक तीव्र वैचारिक द्वंद्व छिड़ गया। हमारे वेद और शास्त्र तो कहते हैं कि हर जीव में ईश्वर का वास होता है। यदि वे अपने द्वार पर आए एक तड़पते हुए इंसान की मदद नहीं कर सकते, तो गंगा स्नान और शुष्क दान-पुण्य से उन्हें मोक्ष कैसे मिल सकता है? क्या केवल कर्मकांड ही मोक्ष का मार्ग हैं, या संकट में पड़े जीव की सेवा ही वास्तविक धर्म है? उन्हें आभास हुआ कि उनकी मोक्ष की इच्छा वास्तव में एक आध्यात्मिक स्वार्थ थी।
उनकी अंतरात्मा ने उन्हें धिक्कारा। उन्हें समझ आ गया कि जिस मोक्ष को वे काशी की गलियों और स्वर्ण मुद्राओं में ढूंढ रहे थे, वह तो उनके पड़ोस में तड़पते हुए एक असहाय व्यक्ति की सेवा में छिपा था।
बिना एक पल गंवाए, पंडित आलोकनाथ ने अपनी वह लाल पोटली उठाई जिसे उन्होंने जीवन भर संजोकर रखा था। वे छाता तानकर तेज बारिश में मंगरू की झोपड़ी की तरफ दौड़ पड़े। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि मंगरू बेसुध पड़ा था और उसकी बेटी सिरहाने बैठी सिसक रही थी। पंडित जी ने अपनी जाति, प्रतिष्ठा और छुआछूत के सारे सामाजिक पाखंड को पीछे छोड़ दिया। उन्होंने मंगरू को अपने हाथों से उठाया, उसके मुंह में पानी डाला और अपनी जमा-पूंजी से तुरंत गाँव के बड़े वैद्य को बुलाने का प्रबंध किया।
सच्चा मोक्ष क्या है?
पूरी रात पंडित आलोकनाथ उस गरीब बीमार के सिरहाने बैठे रहे, उसे समय पर दवाइयाँ देते रहे और अपने हाथों से पंखा झलते रहे। सुबह होते-होते मंगरू की हालत में उल्लेखनीय सुधार होने लगा। उसने जब आँखें खोलीं, तो गाँव के सबसे बड़े पंडित जी को अपने सामने पाकर उसकी आँखों में कृतज्ञता के आँसू आ गए। उसने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा, “पंडित जी, आप तो साक्षात भगवान बनकर आ गए।”
उस क्षण पंडित आलोकनाथ के हृदय में जो असीम शांति, आनंद और संतोष का संचार हुआ, वैसा उन्हें जीवन भर के जप-तप, व्रत और अनुष्ठानों से भी कभी महसूस नहीं हुआ था। उनकी आँखों से भी अश्रुधारा बह निकली। उन्हें वास्तविक ‘मोक्ष’ का अनुभव हो चुका था—वह मोक्ष जो किसी कर्मकांड या परलोक की कल्पना में नहीं, बल्कि इसी धरती पर एक तड़पते हुए जीवन को बचाने और निस्वार्थ भाव से की गई सेवा में निहित है।
पंडित जी समझ गए कि सच्ची मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है, और परोपकार ही मोक्ष का एकमात्र सच्चा द्वार है।
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- रोमांटिक कहानियां (Romantic Story) – दिल को छू लेने वाले प्रेम और अहसासों की दास्तानें।

मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे समाज के यथार्थ, मानवीय संवेदनाओं और नैतिक द्वंद्वों का जीवंत दस्तावेज हैं। उनकी प्रसिद्ध कहानियों में से एक ‘दुर्गा का मंदिर’ (Durga Ka Mandir) भी मानवीय अहंकार, अविश्वास और अंततः सत्य की विजय की एक ऐसी ही बेजोड़ मिसाल है। यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति और ईमानदारी किसी भी बाहरी आडंबर या सामाजिक प्रतिष्ठा से कहीं अधिक मूल्यवान होती है।
आस्था और संदेह का द्वंद्व
विशालपुर गांव के छोर पर स्थित मां दुर्गा का मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं था, बल्कि वह पूरे गांव की आस्था, न्याय और विश्वास की धुरी था। मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित भृगुदत्त थे। पंडित जी अपने धार्मिक ज्ञान और कठोर नियमों के लिए पूरे क्षेत्र में विख्यात थे। वे खुद को धर्म का रक्षक मानते थे, लेकिन इस मान के साथ उनके भीतर एक सूक्ष्म अहंकार भी पनप चुका था। उनके लिए नियमों का पालन करना मानवीय संवेदनाओं से ऊपर था।
इसी गांव में मुरली नाम का एक सीधा-साधा युवक अपनी बूढ़ी मां के साथ रहता था। वे दोनों अत्यंत निर्धन थे और मेहनत-मजदूरी करके अपना पेट पालते थे। अत्यंत गरीब होने के बावजूद, उनका स्वाभिमान ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी थी। मुरली की मां बचपन से ही मां दुर्गा की परम भक्त थी। वह रोज़ सुबह मंदिर की सीढ़ियों को साफ करती और देवी के चरणों में माथा टेककर अपने दिन की शुरुआत करती थी।
जब लगा ईमानदारी पर लांछन
एक दिन सुबह-सुबह मंदिर में एक अप्रत्याशित घटना घटी। जब पंडित भृगुदत्त ने मंदिर के कपाट खोले, तो उन्होंने देखा कि देवी दुर्गा की प्रतिमा पर सुशोभित सोने का बहुमूल्य हार गायब था। मंदिर में चोरी की खबर आग की तरह पूरे गांव में फैल गई। गांव के लोग हैरान थे कि मां के दरबार में ऐसी हिमाकत किसने की।
पंडित भृगुदत्त का संशय सीधे मुरली पर गया, क्योंकि उस सुबह आरती से पहले केवल मुरली और उसकी मां को ही मंदिर के गर्भगृह के आस-पास देखा गया था। पंडित जी ने बिना किसी जांच-पड़ताल या ठोस सबूत के, भरे समाज में मुरली पर चोरी का आरोप मढ़ दिया।
मुरली और उसकी मां ने पंडित जी के पैर पकड़ लिए और रोते हुए अपनी बेगुनाही की गुहार लगाई। मुरली ने कहा, “पंडित जी, हम भूखे सो सकते हैं, लेकिन मां के दरबार में चोरी करने का पाप कभी नहीं कर सकते। हमारी ईमानदारी ही हमारा सब कुछ है।”
लेकिन पंडित जी का अहंकार और समाज का अविश्वास उनके आंसुओं से नहीं पिघला। गांव के कुछ संभ्रांत लोगों ने भी पंडित जी का ही पक्ष लिया और मुरली को चोर घोषित कर दिया।
देवी के दरबार में परीक्षा
मामले को सुलझाने और सत्य को सामने लाने के लिए पंडित भृगुदत्त ने एक कठोर मार्ग चुना। उन्होंने घोषणा की, “यदि तुम वास्तव में निर्दोष हो मुरली, तो तुम्हें कल सुबह मां दुर्गा के मंदिर में सबके सामने अपनी बेगुनाही की कसम खानी होगी। याद रखना, यदि तुमने झूठ बोला, तो देवी का प्रकोप तुम्हारे पूरे कुल को नष्ट कर देगा।”
यह केवल एक कसम नहीं थी, बल्कि यह एक गरीब के स्वाभिमान और उसकी मां की अटूट आस्था की अग्निपरीक्षा थी। उस रात मुरली और उसकी मां के घर में चूल्हा नहीं जला। दोनों रात भर रोते रहे और देवी मां की तस्वीर के सामने प्रार्थना करते रहे। मां ने मुरली का हाथ थामकर कहा, “बेटा, जिसने कभी पाप नहीं किया, उसे डरने की जरूरत नहीं है। मां दुर्गा सब देख रही हैं, वे हमारे साथ अन्याय नहीं होने देंगी।”
सत्य की गूंज और अहंकार का अंत
अगली सुबह पूरा गांव दुर्गा के मंदिर के प्रांगण में जमा हो गया। हर चेहरा उत्सुकता और एक अज्ञात भय से भरा हुआ था। मुरली ने भारी और कांपते कदमों से मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश किया। धूप और कपूर की खुशबू के बीच देवी की भव्य प्रतिमा अत्यंत ओजस्वी लग रही थी।
पंडित भृगुदत्त ने गंभीर आवाज में कहा, “मुरली! गंगाजल हाथ में लो, देवी के चरणों को स्पर्श करो और कहो कि तुमने हार नहीं चुराया है।”
मुरली ने थरथराते हाथों से गंगाजल लिया। उसकी आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे। उसने मां दुर्गा की प्रतिमा की ओर देखा और रुंधे गले से कहा, “हे जगदम्बा! तुम तो घट-घट की जानने वाली हो। यदि मेरे मन में कभी भी कोई मैल आया हो, तो मुझे इसी क्षण भस्म कर दो। लेकिन यदि मैं सच्चा हूँ, तो मेरी मां के सुहाग और स्वाभिमान की रक्षा करना।”
मुरली की आवाज में जो करुणा, सत्य और निश्छलता थी, उसने वहां उपस्थित हर ग्रामीण के हृदय को झकझोर कर रख दिया। पंडित भृगुदत्त भी अंदर से सिहर उठे।
ठीक उसी पल, मंदिर का पुराना सेवक भागता हुआ गर्भगृह में आया। उसके हाथ में वही खोया हुआ सोने का हार था। उसने हांफते हुए कहा, “पंडित जी! अनर्थ होने से बच गया। यह हार चोरी नहीं हुआ था, बल्कि कल श्रृंगार के समय यह मूर्ति के पीछे बने आले के कोने में गिर गया था। आज जब मैं सफाई कर रहा था, तब मेरी नजर इस पर पड़ी।”
यह सुनते ही पूरे मंदिर परिसर में सन्नाटा छा गया। पंडित भृगुदत्त का चेहरा पीला पड़ गया। उनका सारा अहंकार, उनका न्याय का दंभ पल भर में ढह गया। जिस गरीब को वे चोर समझ रहे थे, वह सत्य की कसौटी पर कुंदन की तरह चमका था।
पंडित जी ने ग्लानि से भरकर मुरली और उसकी मां के सामने हाथ जोड़ लिए और कहा, “मुझे क्षमा कर दो। मैं मंदिर का पुजारी होकर भी उस सच्ची भक्ति को नहीं पहचान पाया जो तुम्हारे हृदयों में है। आज मां दुर्गा ने मुझे सिखाया है कि न्याय किसी की सामाजिक हैसियत देखकर नहीं, बल्कि आत्मा की पवित्रता देखकर होता है।”
मुरली और उसकी मां ने रोते हुए मां दुर्गा के चरणों में शीश नवाया। उस दिन मंदिर का घंटा पहले से कहीं अधिक मधुर ध्वनि में गूंज रहा था, मानो स्वयं देवी मुस्कुराकर अपने भक्तों को आशीर्वाद दे रही थीं।
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प्रस्तावना: समाज का एक कड़वा सच
‘विषम कथा’ महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद की उन चुनिंदा कहानियों में से एक है जो भारतीय समाज के उस स्याह पहलू को उजागर करती है, जहां मानवीय भावनाएं और इच्छाएं सामाजिक कुरीतियों और बेमेल व्यवस्थाओं की बलि चढ़ जाती हैं। प्रेमचंद ने अपनी लेखनी के माध्यम से हमेशा समाज के कमजोर वर्गों और महिलाओं की दशा को बयां किया है। ‘विषम कथा’ भी एक ऐसी ही गाथा है जो पाठक के हृदय को झकझोर कर रख देती है।
श्यामा का स्वप्न और यथार्थ का क्रूर प्रहार
कहानी की मुख्य पात्र श्यामा एक अत्यंत सुंदर, चंचल और जीवन से भरपूर युवती है। वह अपनी उम्र के सामान्य सपनों को संजोए हुए बड़ी हो रही थी। उसके मन में भी एक ऐसे जीवनसाथी की कल्पना थी जो उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चल सके। लेकिन गरीबी और सामाजिक बंधनों के कारण उसके पिता ने उसका विवाह एक ऐसे व्यक्ति से तय कर दिया जो उम्र में उससे दोगुने से भी अधिक बड़ा था।
पंडित भृगुनाथ, जो श्यामा के होने वाले पति थे, न केवल वृद्ध थे बल्कि मानसिक रूप से भी संकीर्ण विचारों के थे। वह अपनी धन-दौलत के बल पर श्यामा के यौवन और स्वतंत्रता को खरीदना चाहते थे। श्यामा के लिए यह विवाह कोई गठबंधन नहीं, बल्कि एक कारागार की सजा जैसा था।
बेमेल विवाह और आंतरिक द्वंद्व
विवाह के पश्चात श्यामा जब भृगुनाथ के घर पहुंची, तो उसे वहां केवल सन्नाटा और कड़े नियम-कायदे मिले। जहां वह खुलकर हंसना चाहती थी, वहां उसे घूंघट की आड़ में रहने को मजबूर किया गया। भृगुनाथ का श्यामा के प्रति व्यवहार प्रेमपूर्ण कम और आधिपत्य जमाने वाला अधिक था। वे श्यामा की हर छोटी-बड़ी गतिविधि पर संदेह करते थे।
प्रेमचंद ने यहां पुरुष प्रधान समाज की उस मानसिकता पर कड़ा प्रहार किया है, जहां स्त्री को केवल एक वस्तु समझा जाता है। श्यामा का जीवन उस विषम परिस्थिति में घुटने लगा। उसने अपनी भावनाओं को दबाने की बहुत कोशिश की, लेकिन युवा हृदय की उमंगों को पूरी तरह से नष्ट करना असंभव था।
समाज की विडंबना और त्रासदी
श्यामा के जीवन में एक नया मोड़ तब आया जब उसके पड़ोस में रहने वाले युवा शिक्षक प्रकाश से उसकी सामान्य बातचीत शुरू हुई। प्रकाश एक संवेदनशील और आधुनिक विचारों वाला युवक था। वह श्यामा की पीड़ा को बिना कहे ही समझ जाता था। दोनों के बीच कोई अनुचित संबंध नहीं था, लेकिन वैचारिक सामंजस्य और एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति ने उनके बीच एक मौन रिश्ता कायम कर दिया।
जब भृगुनाथ को इस बात का संदेह हुआ, तो उन्होंने श्यामा पर अत्याचार बढ़ा दिए। समाज के ठेकेदारों ने भी श्यामा के चरित्र पर उंगलियां उठानी शुरू कर दीं। किसी ने भी यह समझने का प्रयास नहीं किया कि इस पूरे ‘विषम’ समीकरण की असली जड़ वह बेमेल विवाह था जिसे समाज ने अपनी स्वीकृति दी थी।
निष्कर्ष: प्रेमचंद का संदेश
कहानी का अंत अत्यंत भावुक और विचारोत्तेजक है। श्यामा सामाजिक बंधनों और भृगुनाथ के अत्याचारों के सामने घुटने टेकने के बजाय आत्म-सम्मान के साथ इस घुटन भरे जीवन से मुक्त होने का मार्ग चुनती है। प्रेमचंद इस कहानी के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि जब तक समाज में बेमेल विवाह और महिलाओं की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने जैसी कुप्रथाएं रहेंगी, तब तक ऐसी ‘विषम कथाएं’ हमारे समाज का हिस्सा बनी रहेंगी।
यह कहानी आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी कि अपने रचनाकाल में थी। हमें अपनी रूढ़िवादी सोच को बदलकर एक ऐसे समाज का निर्माण करना होगा जहां हर व्यक्ति को अपनी इच्छा और सम्मान के साथ जीने का अधिकार हो।
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कप्तान साहब का रौब और व्यक्तित्व
मुंशी प्रेमचंद की कहानियों में भारतीय समाज के विविध रंगों और इंसानी स्वभाव के सूक्ष्म पहलुओं का सजीव चित्रण मिलता है। ‘कप्तान साहब’ भी एक ऐसी ही अनूठी कहानी है, जो हमारे भीतर छिपे स्वाभिमान, अनुशासन और मानवीय संवेदनाओं को उजागर करती है। कहानी के मुख्य पात्र, जिन्हें सब आदर और थोड़े डर के साथ ‘कप्तान साहब’ कहकर पुकारते थे, अपने आप में अनुशासन की एक चलती-फिरती मिसाल थे।
कप्तान साहब का कद लंबा, छाती चौड़ी और चाल में एक फौजी जैसी कड़क थी। हालांकि वे सेना में कभी नहीं रहे थे, लेकिन उनकी दिनचर्या और अनुशासन को देखकर कोई भी उन्हें किसी ऊंचे पद के सैन्य अधिकारी से कम नहीं समझता था। वे सुबह ठीक चार बजे उठते, अखाड़े जाते, कसरत करते और फिर दूध-बादाम का सेवन करते। उनका मानना था कि शरीर को स्वस्थ और मन को अनुशासित रखकर ही कोई भी इंसान जीवन की जंग जीत सकता है।
समाज के प्रति उनका दृष्टिकोण
कप्तान साहब केवल अपने शरीर पर ही ध्यान नहीं देते थे, बल्कि वे समाज में फैली सुस्ती और अनुशासनहीनता के सख्त खिलाफ थे। जब भी वे गली से गुजरते, तो मोहल्ले के नौजवान जो देर तक सोने के आदी थे, उनके डर से उठ बैठते थे। कप्तान साहब का मानना था कि आज की युवा पीढ़ी अपनी ताकत और समय को व्यर्थ के कामों में बर्बाद कर रही है। वे अक्सर युवाओं को डांटते हुए कहते, ‘अगर जवानी में पसीना नहीं बहाया, तो बुढ़ापे में आंसू बहाने पड़ेंगे।’
उनकी इस कड़क आदत के कारण लोग उनका सम्मान तो करते थे, लेकिन उनसे थोड़ा फासला भी बनाकर रखते थे। लोगों को लगता था कि कप्तान साहब के दिल में दया या नरमी नाम की कोई चीज नहीं है। वे केवल नियम-कानून और अनुशासन की भाषा समझते हैं। लेकिन मुंशी प्रेमचंद ने इस कहानी में कप्तान साहब के कठोर बाह्य आवरण के पीछे छिपे एक कोमल और संवेदनशील हृदय को बेहद खूबसूरती से दर्शाया है।
वह घटना जिसने सबको हैरान कर दिया
एक बार गाँव में भयंकर बाढ़ आ गई। लगातार तीन दिनों से हो रही मूसलाधार बारिश ने नदी के बांध को तोड़ दिया था। चारों तरफ पानी ही पानी फैल गया था। लोगों के घर डूबने लगे थे और हर तरफ अफरा-तफरी का माहौल था। गाँव के लोग अपनी जान बचाने के लिए ऊंचे स्थानों की ओर भाग रहे थे।
इसी बीच खबर आई कि नदी के उस पार एक गरीब बुढ़िया और उसका छोटा पोता अपने कच्चे मकान में फंसे हुए हैं। बाढ़ का बहाव इतना तेज था कि कोई भी उस तरफ जाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। गाँव के बड़े-बड़े शूरवीर और नौजवान भी पीछे हट गए। सबको अपनी जान की परवाह थी।
तभी भीड़ को चीरते हुए कप्तान साहब आगे आए। उनके चेहरे पर हमेशा रहने वाला वह कड़ा अनुशासन आज एक गंभीर संकल्प में बदल चुका था। उन्होंने बिना समय गंवाए एक मजबूत रस्सी उठाई और नदी के उफनते पानी में कूदने को तैयार हो गए। लोगों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, ‘कप्तान साहब, पानी का बहाव बहुत तेज है, आपकी जान को खतरा हो सकता है।’
लेकिन कप्तान साहब ने केवल इतना कहा, ‘अनुशासन और बल का असली उपयोग वही है जो दूसरों की रक्षा में काम आए। अगर आज मैं चुप बैठ गया, तो मेरी कसरत और मेरी ताकत पर लानत है।’
साहस और इंसानियत की मिसाल
कप्तान साहब ने उफनती नदी की लहरों से लोहा लेते हुए तैरना शुरू किया। पानी का थपेड़ा उन्हें बार-बार पीछे धकेल रहा था, लेकिन उनके मजबूत इरादों के सामने नदी की लहरों को भी झुकना पड़ा। वे किसी तरह नदी पार कर उस कच्चे मकान तक पहुंचे। मकान का एक हिस्सा ढह चुका था और बुढ़िया अपने पोते को छाती से लगाए रो रही थी।
कप्तान साहब ने बच्चे को अपनी पीठ पर बांधा और बुढ़िया को रस्सी के सहारे सहारा देते हुए सुरक्षित बाहर निकालने की कोशिश की। रास्ते में कई बार ऐसा लगा कि पानी उन्हें बहा ले जाएगा, लेकिन कप्तान साहब के फौलादी हौसले ने हार नहीं मानी। आखिरकार, वे दोनों को सुरक्षित किनारे पर ले आए।
गाँव के लोग जो अब तक कप्तान साहब को केवल एक सख्त और घमंडी इंसान समझते थे, उनकी आँखों में आंसू थे। आज उन्होंने कप्तान साहब का असली रूप देखा था। वे केवल शरीर से ही नहीं, बल्कि मन और आत्मा से भी सच्चे ‘कप्तान’ थे।
कहानी से सीख
मुंशी प्रेमचंद की यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची ताकत और अनुशासन केवल दिखावे के लिए नहीं होते। उनका असली महत्व तब होता है जब वे दूसरों की भलाई और मानवता की सेवा में उपयोग किए जाएं। कप्तान साहब का चरित्र हमें प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन में कड़े सिद्धांतों का पालन तो करें, लेकिन अपने भीतर की संवेदनशीलता और परोपकार की भावना को कभी मरने न दें।
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मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे तत्कालीन समाज का आईना हैं। उनकी कहानियों में आम आदमी का संघर्ष, उसकी बेबसी और कभी-कभी उसका वह ‘दुस्साहस’ दिखाई देता है, जो समाज के स्थापित नियमों को चुनौती देता है। कहानी ‘दुस्साहस’ (Dussahas) भी एक ऐसी ही उत्कृष्ट रचना है, जो मनुष्य के आत्मसम्मान, साहस और सामाजिक असमानता के ताने-बाने को उजागर करती है।
पृष्ठभूमि और पात्रों का परिचय
यह कहानी एक छोटे से गाँव की है, जहाँ जातिवाद, गरीबी और जमींदारी प्रथा का बोलबाला था। कहानी का मुख्य पात्र ‘मंगत’ एक सीधा-साधा, गरीब और ईमानदार मजदूर है। वह दिन-रात मेहनत करता है ताकि अपने परिवार का पेट पाल सके। गाँव के जमींदार ‘ठाकुर बलवीर सिंह’ का पूरे इलाके में खौफ था। ठाकुर के सामने किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि वह आँख उठाकर भी बात कर सके। गाँव के लोग अपनी किस्मत को कोसते हुए ठाकुर की हर ज्यादती को चुपचाप सहन कर लेते थे।
मंगत स्वभाव से शांत था, लेकिन उसके भीतर स्वाभिमान कूट-कूट कर भरा था। वह काम की पूरी मजदूरी चाहता था और बिना वजह किसी की गुलामी करना उसे पसंद नहीं था। यही स्वाभिमान एक दिन उसके जीवन में एक बड़ा मोड़ लेकर आता है।
संघर्ष की शुरुआत
एक दिन ठाकुर बलवीर सिंह के कारिंदे मंगत के घर आए। उन्होंने मंगत से कहा कि ठाकुर साहब की हवेली पर बेगार (बिना मजदूरी के काम) करने चलना है। मंगत ने नम्रता से कहा, “हुजूर, मैं काम पर जरूर आऊँगा, लेकिन मुझे मेरी मेहनत की पूरी मजदूरी मिलनी चाहिए। घर में बूढ़ी माँ बीमार है और बच्चों के लिए अनाज भी नहीं है।”
कारिंदों के लिए यह बात किसी वज्रपात से कम नहीं थी। ठाकुर के राज में कोई अपनी मजदूरी मांगे, यह उनका अपमान था। उन्होंने मंगत को डराया और धमकाया, लेकिन मंगत अपनी बात पर अड़ा रहा। जब यह खबर ठाकुर बलवीर सिंह तक पहुँची, तो उनका खून खौल उठा। उन्होंने इसे एक अदने से मजदूर का ‘दुस्साहस’ समझा।
स्वाभिमान और दुस्साहस का टकराव
अगले दिन ठाकुर खुद अपनी घोड़ी पर सवार होकर मंगत के दरवाजे पर पहुँचे। उनके हाथ में कोड़ा था। गाँव के लोग डर के मारे अपनी खिड़कियों और दरवाजों के पीछे छिप गए। किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह ठाकुर के गुस्से का सामना कर सके।
ठाकुर ने कड़कती आवाज में चिल्लाकर कहा, “मंगत! बाहर निकल। तेरी यह मजाल कि तू मेरी बेगार करने से मना करे? इस गाँव में रहना है तो मेरी शर्तों पर जीना होगा।”
मंगत घर से बाहर निकला। उसकी आँखों में भय नहीं, बल्कि एक अजीब सा ठहराव था। उसने हाथ जोड़कर कहा, “ठाकुर साहब, मैं आपका सम्मान करता हूँ। लेकिन मैं भी एक इंसान हूँ। भूख मेरे बच्चों को भी लगती है। बिना मजदूरी के मैं काम कैसे करूँ?”
ठाकुर का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने कोड़ा हवा में लहराया और मंगत पर बरसाना शुरू कर दिया। कोड़े की हर मार के साथ मंगत के बदन से खून बहने लगा, लेकिन वह जमीन पर नहीं गिरा। उसने चीखने-चिल्लाने के बजाय सीधे ठाकुर की आँखों में देखा। उसकी आँखों में छिपी वह निडरता ही ठाकुर के लिए सबसे बड़ा ‘दुस्साहस’ थी।
बदलाव की एक नई बयार
जब कोड़ों की मार थमी, तो मंगत ने अपने घावों को पोंछते हुए कहा, “ठाकुर साहब, आप शरीर को तोड़ सकते हैं, लेकिन मेरे स्वाभिमान को नहीं। आज के बाद मैं आपकी हवेली पर पैर नहीं रखूँगा, चाहे मुझे भूखा ही क्यों न मरना पड़े।”
मंगत की इस बेबाकी और निडरता ने ठाकुर को भीतर से हिलाकर रख दिया। वे बिना कुछ बोले अपनी घोड़ी मोड़कर वापस हवेली लौट गए। गाँव वालों ने जब मंगत के इस अदम्य साहस को देखा, तो उनके मन से भी ठाकुर का डर धीरे-धीरे कम होने लगा। मंगत के इस ‘दुस्साहस’ ने पूरे गाँव को जगा दिया था। अब लोग अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने लगे थे।
मुंशी प्रेमचंद की यह कहानी हमें सिखाती है कि अन्याय के खिलाफ उठाई गई एक छोटी सी आवाज भी बड़े बदलाव की शुरुआत कर सकती है। स्वाभिमान के साथ जीना ही मनुष्य का असली आभूषण है।
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मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं होतीं, बल्कि वे मानव मन के सूक्ष्म से सूक्ष्म भावों का दर्पण होती हैं। उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘मौज’ (Mauj) भी एक ऐसी ही रचना है, जो मनुष्य की स्वतंत्रता, उसकी आंतरिक इच्छाओं और सामाजिक बंधनों के बीच के द्वंद्व को खूबसूरती से दर्शाती है। आइए, इस कालजयी कहानी के गहरे अर्थों को समझते हुए इसके मुख्य पात्रों और उनके जीवन के उतार-चढ़ाव की यात्रा पर चलते हैं।
प्रस्तावना: जीवन की आपाधापी और ‘मौज’ की चाह
हम सब एक ऐसे समाज का हिस्सा हैं जहाँ हर कोई किसी न किसी दौड़ में शामिल है। कोई पैसे के पीछे भाग रहा है, तो कोई मान-प्रतिष्ठा के पीछे। लेकिन इस भागदौड़ में हम अक्सर उस ‘मौज’ को भूल जाते हैं, जो हमारे भीतर ही कहीं छिपी होती है। प्रेमचंद जी ने इस कहानी के माध्यम से यह संदेश दिया है कि असली आनंद किसी भौतिक वस्तु में नहीं, बल्कि मन की आज़ादी और संतोष में है।
कहानी का नायक, श्यामाचरण, एक साधारण क्लर्क है। उसका जीवन बेहद नियमित और नीरस है। रोज़ सुबह समय पर उठना, दफ़्तर जाना, फाइलों में खोए रहना और शाम को थके-हारे घर लौट आना—यही उसकी दिनचर्या है। उसके जीवन में न तो कोई उत्साह है और न ही कोई नयापन। वह समाज के बनाए नियमों के दायरे में इस कदर बंध चुका है कि अपनी खुद की इच्छाओं को भी भूल चुका है।
जब जीवन में आया बदलाव
एक दिन, श्यामाचरण की मुलाकात एक फकीर से होती है। वह फकीर बिना किसी चिंता के, मस्त होकर नदी के किनारे बैठा गुनगुना रहा था। उसके पास न तो रहने के लिए पक्का मकान था और न ही तिजोरी में बंद धन। फिर भी, उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति और आत्मिक संतोष की चमक थी।
श्यामाचरण कौतूहलवश उस फकीर के पास जाता है और पूछता है, “बाबा, आपके पास कुछ भी नहीं है, फिर भी आप इतने खुश कैसे हैं? क्या आपको कल की चिंता नहीं सताती?”
फकीर मुस्कुराया और बोला, “बेटा, कल की चिंता वो करते हैं जिन्हें खोने का डर होता है। मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं है, इसलिए मैं आज में जीता हूँ। यही मेरी ‘मौज’ है। जब तक मन में इच्छाओं का जाल रहेगा, तब तक इंसान कभी आज़ाद और खुश नहीं हो सकता।”
फकीर की यह छोटी सी बात श्यामाचरण के दिल में उतर गई। उसे महसूस हुआ कि वह जिसे ‘सफलता’ और ‘सुरक्षित भविष्य’ समझ रहा था, वह वास्तव में एक सुनहरी जेल थी जिसमें उसने खुद को बंद कर लिया था।
आंतरिक द्वंद्व और मुक्ति का मार्ग
घर लौटने के बाद भी श्यामाचरण के दिमाग में फकीर के शब्द गूंजते रहे। उसने अपनी पत्नी और बच्चों को देखा, जो अपनी छोटी-छोटी ज़रूरतों के लिए लगातार शिकायतें करते रहते थे। उसे लगा कि वह केवल एक कमाने की मशीन बनकर रह गया है। उसके अंदर का मनुष्य धीरे-धीरे दम तोड़ रहा था।
उसने तय किया कि वह भी कम से कम एक दिन पूरी तरह से अपने तरीके से जिएगा। बिना किसी पाबंदी के, बिना किसी समय सारिणी के। अगले दिन उसने दफ़्तर से छुट्टी ले ली—यह उसके जीवन में पहली बार था जब उसने बिना किसी बीमारी के छुट्टी ली थी।
वह सुबह जल्दी उठकर बगीचे में गया, फूलों की खुशबू ली, बच्चों के साथ खेला और नदी के ठंडे पानी में पैर डालकर घंटों बैठा रहा। उस दिन उसने महसूस किया कि असली अमीरी क्या होती है। उसने वर्षों बाद खुल कर सांस ली थी। यही उसकी ‘मौज’ का दिन था।
निष्कर्ष: मौज का असली संदेश
प्रेमचंद की यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन को केवल कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के बोझ तले दबाकर नहीं जीना चाहिए। निश्चित रूप से कर्तव्य महत्वपूर्ण हैं, लेकिन खुद को खोकर निभाया गया कर्तव्य केवल एक समझौता बनकर रह जाता है। सच्ची ‘मौज’ मन की वह स्थिति है जहाँ हम वर्तमान क्षण का आनंद लेते हैं और अपनी आत्मा के संगीत को सुनते हैं।
हमें भी अपने व्यस्त जीवन में से कुछ पल निकालकर अपनी ‘मौज’ को तलाशना चाहिए, ताकि जीवन केवल एक यात्रा न रहे, बल्कि एक सुंदर उत्सव बन सके।
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